![Deewar Mein Ek Khidki Rahti Thi । दीवार में एक खिड़की रहती थी [ साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत उपन्यास ]](https://m.media-amazon.com/images/I/71+oHMoJ8cL._AC_SL3840_.jpg)

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विनोद कुमार शुक्ल के इस उपन्यास में कोई महान घटना, कोई विराट संघर्ष, कोई युग-सत्य, कोई उद्देश्य या संदेश नहीं है क्योंकि इसमें वह जीवन, जो इस देश की वह ज़िंदगी है जिसे किसी अन्य उपयुक्त शब्द के अभाव में निम्न-मध्यवर्गीय कहा जाता है, इतने खालिस रूप में मौजूद है कि उन्हें किसी पिष्टकथ्य की ज़रूरत नहीं है। यहाँ खलनायक नहीं हैं किंतु मुख्य पात्रों के अस्तित्व की सादगी, उनकी निरीहता, उनके रहने, आने-जाने, जीवन-यापन के वे विरल ब्यौरे हैं जिनसे अपने-आप उस क्रूर प्रतिसंसार का एहसास हो जाता है जिसके कारण इस देश के बहुसंख्य लोगों का जीवन वैसा है जैसा कि है। विनोद कुमार शुक्ल इस जीवन में बहुत गहरे पैठकर दाम्पत्य, परिवार, आस-पड़ोस, काम करने की जगह, स्नेहिल ग़ैर-संबंधियों के साथ रिश्तों के ज़रिए एक इतनी अदम्य आस्था स्थापित करते हैं कि उसके आगे सारी अनुपस्थित मानव-विरोधी ताक़तें कुरूप ही नहीं, खोखली लगने लगती हैं। एक सुखदतम अचंभा यह है कि इस उपन्यास में अपने जल, चट्टान, पर्वत, वन, वृक्ष, पशुओं, पक्षियों, सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्र, हवा, रंग, गंध और ध्वनियों के साथ प्रकृति इतनी उपस्थित है जितनी फणीश्वरनाथ रेणु के गल्प के बाद कभी नहीं रही और जो यह समझते थे कि विनोद कुमार शुक्ल में मानव-स्नेहिलता कितनी भी हो, स्त्री-पुरुष प्रेम से वे परहेज़ करते हैं या क्योंकि वह उनके बूते से बाहर है, उनके लिए तो यह उपन्यास एक सदमा साबित होगा–प्रदर्शनवाद से बचते हुए इसमें उन्होंने ऐंद्रिकता, माँसलता, रति और शृंगार के ऐसे चित्र दिए हैं जो बग़ैर उत्तेजक हुए आत्मा को इस आदिम संबंध के सौंदर्य से समृद्ध कर देते हैं, और वे चस्पाँ किए हुए नहीं हैं बल्कि नितांत स्वाभाविक हैं–उनके बिना यह उपन्यास अधूरा, अविश्वसनीय, वंध्य होता। बल्कि आश्चर्य यह है कि उनकी कविता में यह शारीरिकता नहीं है। -विष्णु खरे Review: Perfect for Book lover! - Great Book! Review: Finding Magic in the Ordinary - 'Deewar Mein Ek Khidki Rehti Thi' took me into the quiet, surreal world of Raghuvar Prasad, Sonsi, and their humble, magical life. The novel gently reminds the reader of the bliss of slow living, free from television, phones, or constant distractions. There is only nature, human goodness, animals, and all living things; even the non-living things feel quietly supernatural. There are no dramatic events or turning points - just the ordinary life of Raghuvar Prasad in his modest chawl, with friendly, all-knowing neighbours; a school where he teaches mathematics; a curious and caring department head; children; an elephant and its mahout; a boy who hides in a tree; and an astonishing life glimpsed through a small window. Sonsi, his wife, enters this small world and shares its magic with him. Adding to this gentle world are Raghuvar Prasad’s parents - selfless, considerate, and deeply loving - whose quiet presence and unconditional care further anchor the story in warmth and humanity. The life Vinod ji paints on both sides of the window is vivid and lyrical - especially the world outside: fragrant trees, an old, loving woman, the pond, fireflies, birds, monkeys, and pathways hardened with compacted cow dung. Even a simple act like fetching water from a hand pump feels refreshing and deeply satisfying through his words. The conversations, too, are gently amusing, where people hear something different from what was said, and sleep-talk feels almost dreamlike. I highly recommend this book to readers who enjoy magical realism and social fiction. Reading this after Vinod Kumar Shukla ji’s passing felt like an act of both grief and discovery - mourning a voice we have lost, while discovering a world that will continue to live, softly and endlessly, through his words.
| Best Sellers Rank | #174 in Books ( See Top 100 in Books ) #2 in Indian Writing (Books) #13 in Contemporary Fiction (Books) |
| Customer Reviews | 4.5 out of 5 stars 2,850 Reviews |
J**A
Perfect for Book lover!
Great Book!
V**R
Finding Magic in the Ordinary
'Deewar Mein Ek Khidki Rehti Thi' took me into the quiet, surreal world of Raghuvar Prasad, Sonsi, and their humble, magical life. The novel gently reminds the reader of the bliss of slow living, free from television, phones, or constant distractions. There is only nature, human goodness, animals, and all living things; even the non-living things feel quietly supernatural. There are no dramatic events or turning points - just the ordinary life of Raghuvar Prasad in his modest chawl, with friendly, all-knowing neighbours; a school where he teaches mathematics; a curious and caring department head; children; an elephant and its mahout; a boy who hides in a tree; and an astonishing life glimpsed through a small window. Sonsi, his wife, enters this small world and shares its magic with him. Adding to this gentle world are Raghuvar Prasad’s parents - selfless, considerate, and deeply loving - whose quiet presence and unconditional care further anchor the story in warmth and humanity. The life Vinod ji paints on both sides of the window is vivid and lyrical - especially the world outside: fragrant trees, an old, loving woman, the pond, fireflies, birds, monkeys, and pathways hardened with compacted cow dung. Even a simple act like fetching water from a hand pump feels refreshing and deeply satisfying through his words. The conversations, too, are gently amusing, where people hear something different from what was said, and sleep-talk feels almost dreamlike. I highly recommend this book to readers who enjoy magical realism and social fiction. Reading this after Vinod Kumar Shukla ji’s passing felt like an act of both grief and discovery - mourning a voice we have lost, while discovering a world that will continue to live, softly and endlessly, through his words.
S**J
Stillness with Soul.
This novel leaves you looking at your own world differently. Long after you close the book, you might find yourself staring at a patch of sunlight on your wall or a window in your room, realizing that magic exists exactly where you choose to look for it.
N**.
Unique
Unique, Poetic, Must Read
D**Y
"दीवार में एक खिड़की रहती थी" और खिड़की के पार आम आदमी की सामग्र दुनिया!
ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त प्रख्यात लेखक विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास है। इस कृति को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है। रघुवर प्रसाद मुख्य पात्र है। सोनसी उसकी पत्नी है। दोनों निम्न मध्यवर्गीय हैं। उनका घर छोटा है। दीवार में एक खिड़की है। खिड़की से बाहर दिखता है। खिड़की के बाहर कूद कर जाया भी जा सकता है। खिड़की पर बच्चे भी खूब आते हैं। उन्हें स्नेह भी खूब मिलता है। जीवन सादा है। कोई बड़ा संघर्ष नहीं। सपने छोटे हैं। रघुवर स्कूल में काम करता है। सोनसी घर संभालती है। उपन्यास में बच्चे हैं। परिवार में प्रेम है। बहुत प्रगाढ़ प्रेम। रिश्ते गहरे हैं। बहुत ही प्रगाढ़ रिश्ते। प्रकृति करीब है। पेड़ दिखते हैं। नदी बहती है। मौसम बदलता है। मेरे विचार से फणीश्वर नाथ रेणु के बाद विनोद कुमार शुक्ल ही ऐसे लेखक हैं जिन्होंने प्रकृति को इतनी सहजता और सरलता से दर्शित किया है। भाषा सरल है। शब्द रोजमर्रा के हैं। वाक्य छोटे हैं। कविता जैसा अहसास है। कल्पना उड़ान भरती है। हास्य कम है। लेकिन जहां है वहां जोर से हंसाता है। पात्रों को नहीं पाठकों को हंसाता है। दुख अगर कहीं है तो वह छिपा है। दुख की शिकायत नहीं। जीवन उत्सव है। छोटी घटनाएँ हैं। चाय बनती है। बातें होती हैं। परिवार के लोग आते हैं। त्योहार मनते हैं। रघुवर और सोनसी का बंधन मधुर है। इतना मधुर कि शब्दों में ना लिखा गया है और ना यहां लिखा जा रहा है। एकदम प्रगाढ़। दोनों का तालाब में स्नान अद्भुत है। तब तक पड़ोस की बूढी अम्मा चुपचाप दो कप चाय रख कर चली जाती है। उसका रोज का ही यह काम है। एक ही कमरा है रघुवर का। उनके माता-पिता आते हैं तो सबके सोने के बाद रघुवर और सोनसी फिर कैसे चुपचाप निकल जाते हैं। तालाब के किनारे सुंदर सी चट्टान है। समतल है। चट्टान बहुत काली है। चट्टान में सोनसी के चांदी और सोने के गहनों के घिसने के निशान भी पड़ते हैं। इसका अर्थ पाठक को लगाना है। लेखक ने तो बस इतना ही संकेत किया है। संवाद सजीव हैं। अनकहा प्रेम तो ऐसा कि सीधे दिल में उतर जाता है। रोज़मर्रा की बातें हैं। फिर भी गहरी हैं। शुक्ल की शैली अनोखी है। साधारण को जादुई बनाते हैं। खिड़की प्रतीक है। यह सपनों को हकीकत से जोड़ती है। बाहर की दुनिया दिखती है। आने जाने का रास्ता भी है। घर के अंदर की गर्माहट बनी रहती है। उपन्यास में यथार्थ है। गरीबी है पर उसका रोना नहीं है। सीमाएँ हैं। आशा बनी रहती है। पात्र संतुष्ट हैं। उनके सपने छोटे हैं। फिर भी पूरे हैं। प्रकृति का चित्रण जीवंत है। पेड़, नदी, सूरज, चांद, तालाब, कमल, आकाश हैं। मौसम बदलता है। रघुवर के पड़ोस में रहने वाली बूढ़ी अम्मा के प्यार की तो बात ही क्या कहें। सानसी की सास का अपनी बहू के प्रति प्रेम और संरक्षण की छाया ऐसी भूल ना भुलाए। बहू की हर गलती को छुपाती है। गलती का हल इतना चुपचाप निकलती है कि रघुवर को भी पता ना लगे। पिताजी को तो घर पता लगने का सवाल ही नहीं उठाता। बूढ़ी अम्मा का प्यार जीवन का हिस्सा है। पाठक को लगता है वह रघुवर के घर में है। खिड़की से झाँकता है। खिड़की से कूद कर तमाम घूम फिर लेता है। शुक्ल का दर्शन स्पष्ट है। सादगी में सौंदर्य है। छोटी चीजों में खुशी है। यह उपन्यास हिंदी साहित्य में अद्भुत ही कहा जाएगा। यथार्थ और कल्पना का मेल है। मीठा मेलजोल है। यथार्थ भी कल्पना ही है। पाठक का मन उसे यथार्थ मान कर चलने लगता है। हास्य, करुणा, और जमीनी वास्तविकता का संतुलन है। रघुवर की बातें हँसाती हैं। पर सोचने को मजबूर करती हैं। सोनसी का स्नेह छूता है। बच्चे मासूम हैं। पड़ोसी सजीव हैं। यह समाज का चित्र है। निम्न मध्यवर्ग का जीवन है। पर यह सार्वभौमिक है। हर पाठक जुड़ता है। उपन्यास का अंत खुला है। जीवन चलता रहता है। कोई नाटकीय मोड़ नहीं। यह सच्चाई है। शुक्ल ने साधारण को असाधारण बनाया। पाठक मुस्कुराता है। सोचता है। जीवन की सुंदरता देखता है। यह कृति अनमोल है। इसे पढ़ना चाहिए। सपनों की दुनिया मिलती है। हकीकत करीब आती है। यह उपन्यास आत्मचिंतन कराता है। यह हिंदी साहित्य की धरोहर है।
S**R
जादुई किताब
बहुत खूबसूरत तरीके से लिखा गया है आप सुंदर कल्पनाओं में डूब जाते है, गद्य में पद्य आपको जगह जगह नजर आएगा जो बहुत उम्दा है मुझे किताब अच्छी स्थिति में प्राप्त हुई जिसका मै शुक्रगुजार हूँ
D**V
Love story book
Very interesting book
S**V
Simple but meaningful book.. simplicity still have magic
किताब का नाम - दीवार में एक खिडकी रहती थी!! लेखक - विनोद कुमार शुक्ल प्रकार - उपन्यास यह कोई तेज़ गति वाली कहानी नहीं है, बल्कि एक शांत, दार्शनिक और बेहद काव्यात्मक रचना है। कहानी एक साधारण इंसान रघुवर प्रसाद के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक साधारण स्कूल शिक्षक है और अपनी पत्नी के साथ सादा जीवन जीता है। ऊपरी तौर पर कहानी में कुछ खास या नाटकीय नहीं होता लेकिन इसकी खूबसूरती इस बात में है कि साधारण चीज़ों को किस तरह देखा गया है। इस किताब में जिस चीजोंका मतलब मुझे समज आया वह यह है !! *दीवार* → ज़िंदगी की बंदिशें, जिम्मेदारियाँ, समाज का दबाव *खिड़की* → उम्मीद, कल्पना, आज़ादी, एक नया नज़रिया ज़िंदगी कभी-कभी एक जैसी और बंधी हुई लगती है | हम खुद को फंसा हुआ महसूस करते है| लेकिन अंदर कहीं एक हिस्सा ऐसा होता है जो अभी भी सांस लेता है, सपने देखता है, और आगे देखता है कभी-कभी ज़िंदगी एक दीवार जैसी लगती है,सीधी, बंद, और थोड़ी-सी थकी हुई। पर उसी दीवार में कहीं एक खिड़की भी रहती है… वो खिड़की, जो हमें याद दिलाती है कि रोज़मर्रा की सादगी में भी एक अलग-सी खूबसूरती होती है, कि हर सीमित सी लगने वाली ज़िंदगी में एक छोटा-सा रास्ता खुला रहता है,उम्मीद का, कल्पना का, और अपनेपन का। 'Deewar Mein Ek Khidki Rehti Thi' सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि एक एहसास है जो सिखाता है कि जादू कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारी नज़र में छुपा होता है।
D**I
What a book!
What a book!
K**H
📖
Great book, different writing style.
Trustpilot
2 weeks ago
2 months ago